सत्ताईसवाँ लोक-रंग एक अवलोकन :: डॉ. रेणु शाही
- A 1 Rajasthani
- 7 नव॰ 2024
- 5 मिनट पठन
अपडेट करने की तारीख: 9 नव॰ 2024
"सत्ताईसवाँ लोक-रंग : एक अवलोकन"
डॉ. रेणु शाही
कला आचार्य, चित्रकार एवं
कलासमीक्षक जयपुर (राजस्थान)
खूबसूरत परिधानों में प्रस्तुति देते देश के कई राज्यों के लोक कलाकार, रंग बिरंगी रोशनी से सजा हुआ केंद्र का परिसर, एक-एक पल को कैमरे में कैद करते कलाप्रेमी और विभिन्न प्रकार के कलात्मक वस्तुओं से सजी दुकाने और स्टॉल्स पर घर के सजावट की वस्तुएँ, विशेषकर दीपावली के त्योहार के नजदीक होने के कारण इनकी अधिक खरीदारी हुई जिनमें कपड़े, काष्ठ व टेराकोटा के आभूषण तथा कलात्मक वस्तुओं, जूट के कलात्मक सामान, हस्तनिर्मिति चित्र, फर्निचर, आर्टिफिशियल ज्वैलरी जैसे कई कलात्मक चीजों की खरीदारी करते हुये लोग, साथ ही कला मेले के मुख्य मंच पर हो रहे नृत्य संगीत का आनंद लेते दर्शक, 'शिल्पग्राम' में यह दृश्य देखने लायक होता है l यह अवसर था जवाहर कला केन्द्र, जयपुर की ओर से आयोजित 27वें लोकरंग महोत्सव का, जिसका उद्घाटन मुख्य अतिथि पर्यटन एवं सांस्कृति सचिव रवि जैन तथा विशिष्ट अतिथि (रूड़ा) की प्रबंध निदेशक डॉ. मनीषा अरोरा के करकमलों द्वारा दीप प्रज्वलित करके अट्ठारह अक्तूबर दो हजार चौबीस को किया गया l

ग्यारह दिवसीय इस मेले के दूसरी ओर केन्द्र के मध्यवर्ती में आयोजित राष्ट्रीय लोक नृत्य का अनोखा प्रदर्शन रहता है l जिसमें सूत्रधार का अपना अलग ही अंदाज दिखता है, वे हर दिन पारंपरिक वेशभूषा में आकर (जो भारत के किसी एक राज्य का होता है) एक नए अंदाज में अपने वाक्यचातुर्य से दर्शकों के साथ मनोविनोद करता है और कार्यक्रम के बीच-बीच में दर्शकों की जिज्ञासा बढ़ाने के लिए प्रश्न भी पूछता है, दर्शकों में से सही उत्तर देने पर हर बार किसी एक को उपहार भी दिया जाता है, उत्तर देने के लिए दर्शकों में होड़ लगी रहती है क्योंकि वहां प्रस्तुतियों से संबंधित प्रश्न ही पूछे जाते है l

इस महोत्सव में देशभर के चार हजार से ज्यादा कलाकारों ने नृत्य एवं नाट्य की प्रस्तुति देकर अपने-अपने हुनर को प्रदर्शित किया है। कार्यक्रम में लोकनृत्य, लोकगायन, लोकवादन की संगीतमयी प्रस्तुतियां रही जो कलाप्रेमियों को मंत्रमुग्ध करने में सफल होती है।

सत्ताइस वर्षों से निरंतर आयोजित होने वाले इस उत्सव में जयपुर के कला प्रेमियों को एक नई ताजगी का एहसास होता है l इसमे जहां कला के विविध रूपों को देखा जा सकता है वहीं इस आयोजन से सम्बन्धित व्यक्तियों के सामुहिक तालमेल को भी देखा जा सकता है, जिन लोगो का "लोकरंग 2024" के सफल आयोजन के पीछे अथक परिश्रम और प्रयास दिखने को मिलता है l

"लोकरंग" के अंतिम दिन कार्यक्रम के रंगारंग समापन के पश्चात जे. के. के. की अतिरिक्त महानिदेशक माननीय अल्का मीना ने आयोजन के सफलतापूर्वक समाप्ति पर सभी कलाकारों एवं सहयोगियों को बधाई दी एवं धन्यवाद ज्ञापित किया, इस लोकरंग को सुन्दर व सफल बनाने में जवाहर कला केंद्र के सहायक निदेशक लतीफ उस्ता कार्यक्रम के वरिष्ठ संचालक राजीव आचार्य, संयोजक छवि जोशी, कॉर्डिनेटर बबिता मदान, वर्षा शर्मा आदि के साथ सहायक प्रबंधक भरत सिंह, कार्यक्रम की रूपरेखा में डॉ. चंद्रदीप हाड़ा, सहयोगी सुशीला चौधरी, अनिल चौधरी और फोटोग्राफी एवं वीडियोग्राफी में धीरज शर्मा और श्याम सुंदर शर्मा रहे, तथा स्वयं सेवक के रूप में ललित, नितेश, कुलदीप, एंजेला, वर्षा आदि ने सहयोग दिया, मंच संचालन में राजेश आचार्य, राजेन्द्र राव, एवं आर. डी. अग्रवाल, रहमान राजा, अर्चना जोशी और आकांक्षा जोशी की भूमिका थी।

मैं देख रही हूँ कि कुछ वर्षो से राष्ट्रीय लोक नृत्य के कार्यक्रम में विदेशी दर्शकों की भी अच्छी-खासी संख्या रहती है, वे लोग भी इस रंगीन व संगीतमय कार्यक्रम का पूरा लुत्फ उठाते है और नियमित रूप से आकर 'राष्ट्रीय लोकनृत्य समारोह में होने वाले प्रस्तुतियों का रसास्वादन करते है l इनमें कुछ भारतीय कला प्रेमी ऐसे भी है जो प्रतिवर्ष इस आयोजन में आते है मानो वह स्वयं ही जवाहर कला केंद्र के कार्यकर्ता हो l सम्भव: वह लोग पूरे साल लोकरंग के आयोजित होने की प्रतीक्षा भी करते है इसीलिए नियमित तरीके से आकर सभी कार्यक्रमों का आनंद लेते है l

मध्यवर्ती में प्रतिदिन सायं में होने वाले लोकरंग की सांस्कृतिक छटा में मणिपुर से लाई हरोबा, थांग ता, माइबी जगोई, मिजोरम से चैरो, अरुणाचल से रिखमपदा, त्रिपुरा से होजागिरी, सांगरेन और धमेल, असम से बीहू, डोमाही कीकान, बिहार से झिझिया, छत्तीसगढ़ से बायर नृत्य और कमार नृत्य, ओडिशा से संभलपुरी नृत्य, मध्यप्रदेश से गुदुमबाजा, बधाई नृत्य और सैला नृत्य, उत्तरप्रदेश की ब्रज की होरी, गोवर्धन लीला और ढेढीया और रास नृत्य, उत्तराखण्ड से छपेली, जौनसारी नृत्य, थड़िया, चौफला, हिमाचल प्रदेश से नाटी व लामा नृत्य, जम्मू- कश्मीर से रउफ तथा डोगरी नृत्य, पंजाब से भांगड़ा और जिन्दवा, गुजरात की तलवार रास, केरबानोवेश और सिद्दि-गोमा, हरियाणा से घूमर व फाग नृत्य महाराष्ट्र से लावणी, गोवा की देखणी और समई, आंधप्रदेश की गरगलू , तमिलनाडू से थपट्टम, कडघम और कावड़ी, कर्नाटक का ज्योति नृत्य तथा अपरो राजस्थान से कालबेलिया, मांगणियार, लंगा गायन, घूमर, चरी, तेरहताल, गेर, ब्रज का ढोला, पद, तमाशा, ख्याल, रम्मत, हेला ख्याल आदि लोकप्रिय नृत्यों प्रस्तुतियाँ किसी को भी अपने ओर आकर्षित करने में सक्षम होती है l

इसी क्रम में लोक रंग के 27वें 'राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेले' की चकाचौंध शिल्पग्राम में प्रतिदिन पूर्वाह से रात्री तक सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के विविध रंगों के रूप में पर्यटकों और दर्शकों को रोमांचित करता था l शिल्प ग्राम में हस्तशिल्प उत्पादों की 150 स्टॉल्स लगायी गयी थी इनमें राष्ट्रीय पुरस्कार, राज्य पुरस्कार प्राप्त शिल्पकार व राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों से आए हस्तशिल्पियों ने अपने उत्पादों की प्रदर्शनी लगायी हुयी थी। पश्चिम बंगाल की धान ज्वैलरी, हैंडमेड ज्वैलरी, राजसमंद का टेराकोटा, जयपुर के जूट क्राफ्ट, पेपरमेशी, लाख, टेक्सटाइल, नागौर के मार्बल उत्पाद व उत्तर प्रदेश के फर्नीचर, ब्लू पॉटरी, कारपेट, हँड ब्लॉक प्रिंटिंग, नागालैंड के ड्राई फ्लावर्स, असम के बैम्बू क्राफ्ट, मध्य प्रदेश की सेरेमिक पेंटिंग, लकड़ी के खिलौने आदि प्रमुख रहें हैं।

शिल्पग्राम के मुख्य मंच पर प्रतिदिन सायं जो लोक विधाओं की प्रस्तुति होती थी l बावजूद इसके मेले के चयनित स्थलों पर राजस्थान के लुप्तप्राय वाद्ययंत्रों यथा रावणहत्या, कमायचा, पाबूजी की फड़, कठपुतली आदि कलाओं की प्रस्तुति भी होती थीं जिनके साथ बहुरूपिया, जादू, नट, बड़ी-बड़ी चलती-फिरती मानव कठपुतलियां, कच्चि-घोड़ी आदि घूमते फिरते चंचल कलाओं ने दर्शकों को खूब रोमांचक किया उन्होंने उनके साथ फोटो खिंचवाने और नृत्य करने का आनंद भी उठाया l मेले के मुख्य मंच पर जो प्रस्तुतियाँ हुयी उनमें कुछ अनोखी एवं हास्यास्पद तथा कुछ आध्यात्मिक रही जैसे जादू का खेल, बालम छोटे सो, रामायण का प्रसंग, ख्याल, भगवान शिव की कथा, मयूर नृत्य में अलौकिक प्रेम का रस दर्शकों को भाव विभोर कर गई l

मेले के एक तरफ शिल्पग्राम के मुख्यद्वार के सामने वाले परिसर मे रंग-चौपाल बनाया गया था, जहां विविध लोक नाट्यों का प्रदर्शन, पद दंगल, हेला ख्याल, रम्मत, और तमाशा आदि चलता रहता था यहां का आनंद नीचे घास पर बैठकर लिया जाता था l

मेले के मुख्य मंच पर रात्रि में संगीतमय कार्यक्रम का एक बार पुनः आयोजन किया जाता था जो रात आठ बजे के बाद से प्रारंभ होकर लोक गीतों, लोक भजनों का सुरीला स्वर प्रवाह उस दिन के मेले समाप्त होने के समय तक श्रोताओं को संगीत से सराबोर करता रहता, संभवतः यह अपने आप में एक अलग तरीके का अनूठा आयोजन है जिसमें पग-पग पर कलात्मक प्रस्तुतियां मिलती है वो भी खरीदारी करने के साथ में l








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