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"लोक कलायें ', जनमानस की कला का एक रूप ' : Dr. Renu Shahi

  • लेखक की तस्वीर: A1 Raj
    A1 Raj
  • 30 जुल॰ 2024
  • 2 मिनट पठन


सभी कलाएं मानव हृदय को आनंदित करती है, साथ ही कला कर्म करने वाले भी कलानिर्माण करते हुए पूरे मनोभावों के साथ अपने सृजन का रसास्वादन करते है जो दर्शक के समक्ष उन भावनाओं को प्रस्तुत करने मे एक महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते है जैसा कि सृजनकर्ता के मन में रहा होता है l इस बात को सत्य साबित करती है जवाहर कला केंद्र में आयोजित की 'लोककला' प्रदर्शनी l जयपुर के अतिशय कला संस्थान द्वारा हाल ही में भारत देश की लोककला पर आधारित सामूहिक चित्र प्रदर्शनी का आयोजन अट्ठाइस जुलाई को जवाहर कला केन्द्र की सुरेख कला दीर्घा मे किया गया l

प्रदर्शनी का उद्घाटन मुख्य अतिथि लक्ष्मण व्यास एवं विशिष्ट अतिथि कलाविद प्रो. चिन्मय मेहता ने दीप प्रज्वलन के साथ किया। संस्थान की अध्यक्ष कलाविद् डॉ. रीता प्रताप ने अतिथियों का परिचय देते हुए उनके के व्यक्तिव व कला यात्रा के बारे मे बताया तथा मूर्ति कला के क्षेत्र में लक्ष्मण जी के योगदान की सराहना की l चित्रों का अवलोकन करते हुए प्रो. मेहता ने कलाकारों से अपने अनुभवों को भी साझा किया और कलाकारों को कहा कि वे निरंतर सृजन में जुटें रहें।

प्रदर्शनी में लगभग पैंतालीस कलाकारों नेअपनी कलाकृतियों को प्रदर्शित किया है। जिसमे मुख्य डॉ. रीता पांडे, वंदना पांडे, नंदिनी, सुमन शिकार, रश्मि भाती, राधा अग्रवाल, किरण राजे, एकता दधीचि, गार्गी, हेमा वर्मा, नीलम नियाजी, मीनाक्षी खिची, श्रीकांत, पूनम, बिन्दु, रीना तोमर, पूजा भारद्वाज, शिखा, पलक शर्मा, कृष्णा आदि की कृतियां प्रदर्शनी की श्रेष्ट कृतियां रही l सुरेन्द्र नोहर, शिल्पा,दिव्या कुकदा,पायल सैनी, निधि शर्मा, दीपिका पारीक, कौशल्या, द्रौपदी मीना, शिरीन गुप्ता, दीपशिखा मेहता, अंजू परवीन, सुष्मिता दास, सरोज सीपानी ने अपनी-अपनी से प्रदर्शनी में सहभागिता किया l

वस्तुतः यह एक लोककला प्रदर्शनी थी लेकिन कुछ वरिष्ठ कलाकारों की कृतियां भी थी l जिन्हें आमंत्रित किया गया था जिनमें राधा-कृष्ण, फ़ूलों, दृश्यचित्र, मत्स्य, माँ'- बच्चा और लघु चित्रशैली पर आधारित चित्र थे, एक और कलाकृति जो सबके आकर्षण का केंद्र रही वो थी 'केतली और चाय के कप' जिसे कलाकार श्री कांत ने बहुत ही कलात्मक तरीके से सजाया है, चित्र 'घुमर' के माध्यम से निधि शर्मा ने राजस्थान की लोक संस्कृति का बहुत ही सुन्दर चित्रण किया है जिसमें राजस्थानी परिधान में घूंघट ओढ़कर स्त्रियां नृत्य कर रही है और उनकी भाव-भंगिमाओं में एक सहजता का प्रदर्शन है, सुष्मिता की कृति बंगाल की लोक रंगों व भाव से परिपूर्ण है, द्रौपदी ने मधुबनी में स्त्री सौंदर्य, पूजा ने गणेश जी, पूर्णिमा पंथ ने धागे के माध्यम से युगल के प्रेम, किरण राजे ने उड़ीसा की लोक कला एवं वर्ली आर्ट को बनाया है मीनाक्षी ने रास लीला का बहुत ही सुंदर चित्रण किया है l लगभग सभी कलाकारों की कृतियां सराहनीय रही l परंतु कुछ श्रेष्ठ कृतियों को पुरस्कृत किया गया l

उन्नतिश जुलाई को प्रदर्शनी का समापन किया गया जिसमें वरिष्ठ कलाकार पद्मश्री तिलक गीताई एवं आई. यू. ख़ान, अध्यक्ष चित्रकला विभाग राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर द्वारा उत्कृष्ट चित्रों के लिए कलाकारों को नगद पुरस्कार और प्रमाणपत्र देकर सम्मानित किया गया।

इस अवसर पर अतिशय कला संस्थान के सचिव प्रो. एस डी. मिश्रा, राजकुमार चौहान, संदीप शर्मा, येन. यल. जेवरिया, मीना जैन, रेणु शर्मा, डॉ. रेणु शाही, बाबु लाल जाट, दिनेश सैनी, रवि, इन्द्र मोहन, करीना मीना, रिया शेखावत आदि कला विद्यार्थी भी उपस्थित थे l

आलेख: डॉ. रेणु शाही, कला समीक्षक एवं सहायक आचार्य, ललित कला महाविद्यालय, जयपुर, राजस्थान l

 
 
 

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