प्रयास कला उत्सव एक कलात्मक अवलोकन
- A 1 Rajasthani
- 4 अक्टू॰ 2024
- 7 मिनट पठन
"प्रयास" कला उत्सव: एक कलात्मक अवलोकन'
आलेख - डॉ रेनू शाही (सहायक आचार्य, चित्रकला विभाग) राजस्थान स्कूल ऑफ़ आर्ट, जयपुर.
सितंबर 26 से 30 - 2024 तक हिन्दू आध्यात्मिक एवं सेवा मेले का आयोजन दशहरा मैदान आदर्श नगर जयपुर में किया गया l

जिसके अंतर्गत कलानेरी कला दीर्घा के सहयोग से ‘प्रयास कला उत्सव : प्रकृति से संस्कृति' का भव्य उद्घाटन अखिल शुक्ल और योगेंद्र सिंह नरूला, कला उत्सव के मार्गदर्शक डॉ. सुरेंद्र सोनी, संयोजक विजय कुमार शर्मा द्वारा माँ सरस्वती के सामने दीप प्रज्वलित करके किया गया।

इस महोत्सव का आयोजन एक ऐसी पृष्ठभूमि में किया गया जहाँ से कला और कलाकार को एक व्यापक मंच मिल सके, यह केवल कला का उत्सव ही नहीं, वरन भारतीय संस्कृति और समर्पण का प्रतीक भी था। इस उत्सव का मुख्य उद्देश्य कला के माध्यम से संदेश फैलाना और युवाओं को प्रोत्साहित करना भी रहा। भारतीय संस्कृति की समृद्धि और विविधता को प्रदर्शित करने के लिए इस प्रकार के आयोजनों का महत्व और भी बढ़ जाता है क्योंकि ये युवा कलाकारों को अपनी पहचान बनाने का अवसर प्रदान करते हैं।

इसी शृंखला में 28 सितंबर को अतिथि कलाकारों द्वारा जिवंत चित्रण का आयोजन किया गया जिसमें देश भर से आए लगभग 60 कलाकारों ने अपने कृतियों के माध्यम से सामाजिक, धार्मिक और प्राकृतिक दृश्यों को दिखाया, इस कार्यशाला में सभी को कला के माध्यम से विचार व्यक्त करने और संवाद स्थापित करने का एक अनूठा मंच मिला है।

मैंने जब कलाकारों से उनके कृतियों का उनके विचारों से संबंध पूछा तो कुछ कलाकारों के कलात्मक अभिव्यक्ति से मेरा परिचय भी हुआ, जिसमें युवा एवं वरिष्ठ दोनों तरह के कलाकारों थे जिनसे मेरी वार्ता हुई जैसे उत्तराखंड की प्राकृतिक सुंदरता और पर्यावरणीय समस्याओं को उजागर करते हुए उत्तराखंड से आये अतिथि कलाकार डॉ. राजकुमार पांडेय ने अपनी कला के माध्यम से भूस्खलन और पर्यावरण क्षति जैसे गंभीर मुद्दों पर सबका ध्यान आकर्षित किया है। उनकी पेंटिंग्स में वनों की कटाई और पहाड़ों के अत्यधिक दोहन के कारण उत्पन्न भूस्खलन की समस्या को प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है। डॉ. पांडेय के चित्र में काले रंग को सूखे वृक्षों का प्रतीक और लाल व पीले रंगों को आशा, उम्मीद और प्रेम के प्रतीक के रूप में दर्शाया गया है। उनकी कला में प्रत्येक रंग जीवन और पर्यावरण के विभिन्न पहलुओं को प्रदर्शित करता है, जो दर्शकों को प्रकृति के प्रति उनकी जिम्मेदारियों की याद दिलाता है। उनके चित्र में सामाजिक प्रभाव भी दिखाता है, जो दर्शकों को सोचने पर मजबूर करता है कि कैसे हम अपनी प्राकृतिक धरोहर की रक्षा स्वयं कर सकते हैं।

मुम्बई से आये युवा कलाकार संदीप रावल के चित्र में मृत्यु को जीवन का अंतिम सत्य और आत्मिक सुख के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उनका संदेश स्पष्ट है कि मनुष्य जीवनभर मूल्यवान वस्तुओं और धन का संग्रह करता है लेकिन उसे यह समझना चाहिए कि मृत्यु और जन्म निश्चित हैं। आपके द्वारा संचित धन का अधिकारी आपकी मृत्यु के बाद दूसरे लोग हो जाते है। इसलिए सत्कर्मों का संग्रह करना आवश्यक है। धन के साथ मानव मूल्यों की रक्षा करना भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि धन का प्रभाव क्षणिक है, परंतु सत्कर्मों की खुशबू हमेशा बनी रहती है। उनकी कृतियाँ दर्शकों को एक गहरा संदेश देती हैं कि हमें भौतिक चीजों से अधिक आत्मिक मूल्यों की ओर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

दिल्ली से पधारी डॉ. रेनू यादव ने अनुशासन व सुंदरता विषय को लेकर चित्रण किया है वह बताती है कि मेरा चित्र प्रकृति की सुंदरता और शांति को दर्शाता है। पत्तियों के बीच मक्खियों का झुंड हमें अनुशासन सिखाता है। ये छोटे जीव अपनी जीवन-यापन के लिए पत्तियों पर निर्भर रहते हैं। पेड़ से लिपटी पत्तियाँ जीवन में बढ़ते रहने और संघर्ष करने का प्रतीक हैं। ये जड़ों से जुड़ी रहकर भी रोशनी की ओर बढ़ती हैं, जैसे हम अपने अनुभवों से सीखकर आगे बढ़ते हैं। विभिन्न रंगों से सजी उनके चित्र जीवन के बीच गहरे संबंधों को दर्शाती है चित्र में एक वृक्ष की मजबूती और पत्तियों की कोमलता व संतुलन भी है। यह चित्र हमें प्रकृति से स्थिरता और शांति की प्रेरणा देता है।

जयपुर के वरिष्ठ कलाकार आशा राम मेघवाल ने स्त्री और प्रकृति के नाजुक पक्ष को चित्रित किया है, देवेन्द्र भारद्वाज, अमित कल्ला, डॉ. मनीषा खींची, पवन टांक, नेमी चन्द सोनी, श्याम सुन्दर शर्मा, एकता दाधीच, अशोक वर्धन भार्गव, हरि शंकर बालोठिया, डॉ. अन्नपूर्णा शुक्ला
जैसे वरिष्ठ कलाकारों ने अपने-अपने कला से कार्यक्रम की शोभा बड़ाई l कुछ ने अमूर्तन शैली में संघर्ष को दिखाया तो वही एक विद्यार्थी एवं राष्ट्रीय कला मंच से जुड़ी कलाकार पूजा गोस्वामी ने एक अनूठी तकनीक का प्रयोग करते हुए काष्ठ के धरातल को जलाकर चित्रण किया l टीना ललावट ने अनोखे पोत का निर्माण कर कला कृति तैयार की l मैंने ने अपने चित्र में काशी के गंगा घाट और मंदिरों की भव्यता को उजागर किया है। काशी, जिसे सनातन का तीर्थ माना जाता है जो भारतीय संस्कृति और आस्था का प्रतीक है मेरे चित्रों में घाटों की जीवंतता, मंदिरों की भव्यता देखी जा सकती है l रंगों और प्रकाश का समृद्ध उपयोग काशी के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक माहौल को जीवंत बनाता है तथा दर्शकों को काशी के अद्वितीय अनुभव में लिप्त करता है और इस प्रकार मैंने काशी को कला के माध्यम से एक नई पहचान दी है। यह न केवल काशी के धार्मिक महत्व को उजागर करती है बल्कि इसे मैंने एक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में भी दिखाया है l

मेले में प्रख्यात मूर्तिकार श्री महावीर भारतीय द्वारा बनाई गई महान विभूतियों की मूर्तियाँ भी दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहीं। उनकी कृतियाँ न केवल कलात्मकता का प्रदर्शन करती हैं बल्कि वे भारतीय संस्कृति और इतिहास के प्रति गहरे सम्मान को भी प्रकट करती हैं। यह मूर्तियाँ दर्शकों को भारतीय कला की समृद्ध विरासत से जोड़ती हैं और प्रेरणा देती हैं। मूर्तियों में एक गहराई है, जो दर्शकों को आकर्षित करती है और उन्हें भारतीय संस्कृति के विभिन्न पहलुओं का अनुभव कराती है।

इस कला उत्सव में मेले की थीम पोस्टर और चित्रकला प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था जिसमें विद्यालय व महाविद्यालय के विद्यार्थियों ने भाग लेकर रचनात्मकता का प्रदर्शन करते हुए सनातन संस्कृति, पर्यावरण और देश प्रेम पर उत्कृष्ट पोस्टर बनाए। यह प्रतियोगिता विद्यार्थियों के लिए अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर भी था जिसमें उन्होंने अपने विचारों और भावनाओं को चित्रों के माध्यम से व्यक्त किया। इस प्रतियोगिता में से छह उत्कृष्ट कृतियों का चयन किया गया, जिन्हें ‘प्रयास’ आर्ट फेस्टिवल की तरफ से विशेष सम्मान देकर पुरस्कृत किया जाएगा। निर्णायक के रूप में प्रो. चिन्मय मेहता, जयशंकर शर्मा, गुणवंत कोठारी और हिन्दू आध्यात्मिक सेवा मंडल के अध्यक्ष सुभाष बाफना जैसे प्रतिष्ठित व्यक्तित्व शामिल थे। इन सदस्यों ने पारदर्शिता और निष्पक्षता के साथ चयन प्रक्रिया का संचालन किया, जिससे प्रतियोगिता की गरिमा और बढ़ गई।




























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