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डॉ. रेणु शाही ने 'राजस्थानी लोक कला शैली एवं लोक परंपरा' पर अमरकंटक के राष्ट्रीय संगोष्ठी में दिया शोध प्रस्तुति

  • लेखक की तस्वीर: A1 Raj
    A1 Raj
  • 22 फ़र॰ 2024
  • 2 मिनट पठन


भारत देश के एक कलात्मक राज्य मध्यप्रदेश के तीर्थ स्थाल, माँ नर्मदा के उद्गम स्थान अमरकंटक में 16 से 20 फरवरी तक देश के प्रतिष्ठित संस्थान ' इंडियन आर्ट हिस्ट्री कॉंग्रेस', गुवाहाटी (जो कि भारतीय कला एवं पुरातात्विक पक्ष के सभी पहलुओं के ऊपर शोध का कार्य करवाती है) तथा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजाति विश्विद्यालय, अमरकंटक, मध्यप्रदेश के तत्वावधान में संयोजित रूप से "भारतीय कला पर लोक एवं जनजाति तत्वो के प्रभाव" शीर्षक पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया l

जिसमें जयपुर (राजस्थान) से डॉ. रेणु शाही को शोध-पत्र प्रस्तुत करने का शुअवसर मिला इन्होंने नाथद्वारा शैली में लोक परंपराओं, लोक तत्वों, लोक मान्यताओं एवं लोक कथाओं को केन्द्रित करने हुए एवं एक लघु चित्र शैली जो कि राजस्थान के चार प्रमुख चित्र शैलियों मारवार, मेवाड़, ढूंढार एवं हाड़ौती में से मेवाड़ की एक उप-शैली नाथद्वारा शैली के वर्तमान स्वरूप के ऊपर अपना शोध-पत्र प्रस्तुत किया l

जो सभी कला मर्मज्ञ, इतिहासकारों एवं बुद्धजीवियों द्वारा सराहा गया I

दृश्यकला से संबंध रखने वाली डॉ. रेणु शाही मूलतः उतर प्रदेश के गोरखपुर से तालुक रखती है तथा अपनी कलाशिक्षा वाराणसी उतर प्रदेश में रहकर पूर्ण किया हैं l यह वर्तमान में जयपुर में रहते हुये एक कला महाविद्यालय में शिक्षण के साथ-साथ लेखन एवं कला इतिहास पर शोध एवं समीक्षा का कार्य भी करती है l अबतक इनके लगभग तीस से चालीस शोध कार्य एवं कला समीक्षाएं अलग-अलग पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके है l

साथ ही कलात्मक गतिविधियों में भी भागीदारी करती है l चित्रकारी के साथ-साथ लेखक में भी सक्रिय है l इनका कहना है कि 'निरंतर एवं मंदगति का प्रवाह एक सुखद अनुभूति होती है' l जो कि एक कला विद्यार्थी के लिए आवश्यक है l

 
 
 

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