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गंगा दशहरा पर जयपुर में धूमधाम से आयोजित हुई गंगा माता की झांकियां, 51 किलो पंचामृत से हुआ अभिषेक

  • लेखक की तस्वीर: A1 Raj
    A1 Raj
  • 5 जून 2025
  • 2 मिनट पठन

गंगा दशहरा पर जयपुर में धूमधाम से आयोजित हुई गंगा माता की झांकियां, 51 किलो पंचामृत से हुआ अभिषेक


जयपुर, 5 जून 2025 — गंगा दशहरा के पावन अवसर पर जयपुर के ऐतिहासिक गोपाल जी के रास्ते स्थित गंगा माता मंदिर में विशेष आयोजन का भव्य दृश्य देखने को मिला। श्रद्धालुओं की भारी भीड़, भक्ति से भरी वाणी, और भव्य झांकियों के बीच गंगा मां की सात झांकियों का आयोजन बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ किया गया। यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक रहा, बल्कि समाज में आध्यात्मिक एकता और परंपरा की सुंदर झलक भी प्रस्तुत कर गया।

कार्यक्रम की शुरुआत प्रातःकालीन मंगला झांकी से हुई, जिसमें गंगा माता को माखन-मिश्री का भोग अर्पित किया गया। यह झांकी गंगा माता की सादगी, शुद्धता और वात्सल्य का प्रतीक मानी जाती है। इसके बाद वैध धूप झांकी निकाली गई, जिसमें मंदिर वैध धूप जलाई गई, जिससे वातावरण सुगंधित और शुद्ध हो गया।

तीसरी झांकी श्रृंगार झांकी रही, जिसमें गंगा माता को विविध आभूषणों और फूलों से सजाया गया। रेशमी वस्त्रों में सुसज्जित गंगा माता की यह छवि भक्तों को अत्यंत भावविभोर कर गई। इसके पश्चात चौथी झांकी राजभोग झांकी के रूप में प्रस्तुत की गई, जिसमें माता को विभिन्न प्रकार के व्यंजन और प्रसाद अर्पित किए गए।

पांचवी झांकी पंचामृत झांकी रही, जो आयोजन का मुख्य आकर्षण बनी। इस विशेष अवसर पर मंदिर के महंत महाराज महेंद्र कुमार शर्मा द्वारा गंगा माता का पंचामृत से विधिवत अभिषेक किया गया। इस अभिषेक के लिए 51 किलो पंचामृत तैयार किया गया, जिसमें 30 किलो दूध, 10 किलो दही, 10 किलो भूरा, शुद्ध शहद और पवित्र गंगाजल सम्मिलित किया गया था। यह अभिषेक भक्तों के बीच विशेष श्रद्धा का केंद्र बना रहा।

इसके अतिरिक्त दो और झांकियां—संध्या आरती झांकी और शयन झांकी—का आयोजन हुआ, जिसमें भव्य दीपों से मंदिर परिसर जगमगाया और अंत में माता का शयन विधान किया गया।

मंदिर परिसर को रंग-बिरंगे फूलों, तोरणों और दीपों से सजाया गया था। इस अवसर पर सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचे और गंगा माता की आराधना में शामिल हुए। भजन-कीर्तन, कथा वाचन और गंगा महिमा का गुणगान करते हुए भक्तों ने पूरे दिन आस्था और उल्लास के साथ उत्सव मनाया।


यह आयोजन न केवल धार्मिक आयोजन था, बल्कि यह सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत बनाए रखने का एक प्रेरणादायी उदाहरण भी रहा। आयोजकों और स्थानीय श्रद्धालुओं ने इसे सफल बनाने में पूर्ण सहयोग दिया।


गंगा दशहरा का यह पर्व यह संदेश लेकर आया कि जैसे गंगा जल पवित्र करता है, वैसे ही हमें अपने जीवन को भी आत्मिक रूप से शुद्ध और सदाचार से परिपूर्ण बनाना चाहिए।

 
 
 

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