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अंग्रेजी नववर्ष और धार्मिक स्थलों पर इसका अनुचित प्रभाव

अंग्रेजी नववर्ष और धार्मिक स्थलों पर इसका अनुचित प्रभाव


भारतीय संस्कृति का मूल आधार सनातन धर्म है, जो हमारी परंपराओं, संस्कारों और धर्मस्थलों से जुड़ा हुआ है। मंदिर, मठ और अन्य धार्मिक स्थल न केवल पूजा-अर्चना के केंद्र हैं, बल्कि यह भारतीय संस्कृति और विचारधारा के संवाहक भी हैं। लेकिन आज की स्थिति में अंग्रेजी नववर्ष का प्रभाव हमारे धर्मस्थलों पर भी दिखने लगा है, जो हमारी सांस्कृतिक जड़ों के लिए चिंता का विषय है।

क्या हमने कभी चर्च में भारतीय नववर्ष का जश्न देखा है?

1. धार्मिक निष्ठा का उदाहरण:

• क्या आपने कभी देखा है कि किसी चर्च में हमारे चैत्र शुक्ल प्रतिपदा या दीपावली जैसे भारतीय पर्वों का जश्न मनाया गया हो?

• क्या किसी मस्जिद या गुरुद्वारे में भारतीय नववर्ष को लेकर कोई विशेष आयोजन या रील बनाई गई है?

• इसका उत्तर स्पष्ट है – नहीं। यह समुदाय अपने धार्मिक और सांस्कृतिक आदर्शों पर अडिग रहते हैं और दूसरों की परंपराओं से प्रभावित हुए बिना अपनी पहचान बनाए रखते हैं।

2. मंदिरों का दुर्भाग्य:

• इसके विपरीत, कई मंदिरों में 31 दिसंबर और 1 जनवरी को अंग्रेजी नववर्ष के नाम पर विशेष आरती, पूजा, और यहां तक कि रील्स और गानों का निर्माण भी होता है।

• ऐसा क्यों? क्या हमारे पुजारियों और मठाधीशों को अपनी परंपराओं पर गर्व नहीं है?


मंदिरों में अंग्रेजी नववर्ष क्यों नहीं मनाया जाना चाहिए?

1. धार्मिक स्थानों की गरिमा बनाए रखें:

• मंदिर केवल पूजा और साधना के स्थान हैं, न कि विदेशी परंपराओं का पालन करने का।

• अंग्रेजी नववर्ष को मंदिर में मनाने से इसकी गरिमा को ठेस पहुंचती है।

2. संस्कृति का अपमान:

• जब हम मंदिरों में अंग्रेजी नववर्ष मनाते हैं, तो यह हमारी अपनी संस्कृति और नववर्ष परंपराओं का अपमान है।

• भारतीय नववर्ष (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा) का न केवल आध्यात्मिक महत्व है, बल्कि यह प्रकृति, कृषि और समाज से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।

3. विदेशी परंपरा को बढ़ावा देना:

• अंग्रेजी नववर्ष एक औपनिवेशिक परंपरा है, जिसे जबरदस्ती हमारे समाज पर थोपा गया।

• इसे मंदिरों में मनाना हमारी संस्कृति को कमजोर करने जैसा है।


पुजारियों और धर्मगुरुओं के लिए अपील


आदरनीय पुजारीगण और धर्मगुरु,

आप भारतीय संस्कृति के रक्षक हैं।

1. अपनी जड़ों को पहचानें:

• अंग्रेजी नववर्ष मनाने के बजाय, भारतीय नववर्ष को विशेष महत्व दें।

• मंदिरों में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, दीपावली और अन्य भारतीय पर्वों को भव्य रूप से मनाएं।

2. धार्मिक स्थलों की गरिमा बनाए रखें:

• मंदिर केवल पूजा, यज्ञ और साधना के लिए हैं। विदेशी परंपराओं को यहां स्थान न दें।

3. जनता को प्रेरित करें:

• अपने उपदेशों और प्रवचनों के माध्यम से लोगों को भारतीय परंपराओं के महत्व को समझाएं।

• सोशल मीडिया का उपयोग भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए करें।


सामाजिक जागरूकता की आवश्यकता

1. जनता को समझना होगा:

• हमें यह समझना होगा कि विदेशी परंपराओं को अपनाने से हमारी अपनी पहचान खतरे में पड़ सकती है।

• अगर हम अपने धर्मस्थलों और परंपराओं की रक्षा नहीं करेंगे, तो अगली पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ पाना मुश्किल होगा।

2. परंपराओं को पुनर्जीवित करें:

• भारतीय नववर्ष, रामनवमी, और मकर संक्रांति जैसे पर्वों को सामाजिक और धार्मिक स्तर पर भव्यता से मनाएं।

• इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए सामूहिक प्रयास करें।

3. सोशल मीडिया का सही उपयोग:

• भारतीय नववर्ष और अन्य पर्वों पर सोशल मीडिया पर प्रचार करें।

• सकारात्मक संदेश फैलाने के लिए वीडियो, लेख, और पोस्ट बनाएं।


अंतिम संदेश


भारतीय संस्कृति केवल पर्व और त्योहारों का संग्रह नहीं है; यह हमारे जीवन का मार्गदर्शन करती है।

• मंदिरों, मठों और धर्मगुरुओं का कर्तव्य है कि वे हमारी परंपराओं को जीवित रखें।

• अंग्रेजी नववर्ष जैसी विदेशी परंपराओं को अपनाने के बजाय, अपनी संस्कृति और त्योहारों का प्रचार-प्रसार करें।


🌿 “संस्कृति की रक्षा, धर्म की रक्षा है।” 🌿

आयुष शर्मा

स्वतंत्र लेखक ✍️

 
 
 

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