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"रंग-सूत्र : एक धागे में पिरोने का प्रयास " : डॉ. रेणु शाही

  • लेखक की तस्वीर: A1 Raj
    A1 Raj
  • 12 सित॰ 2023
  • 15 मिनट पठन


सृष्टि में सृजन का अभिप्राय नारी से बेहतर कोई हो ही नहीं सकता l मैं ये नहीं कहती कि इसमें पुरुष का योगदान कम होता है l परन्तु देवता भी अपनी- अपनी शक्ति रूपों के अभाव में पूर्ण नहीं होते I मुझे याद है कि जब भी मैं आध्यात्मिक पक्ष से विचार करके देखती हूँ तो यह पाती हूँ कि उन्हें अपने कार्य को पूरा करने हेतु "नारी" के रूप आना पड़ा l जैसे - विष्णु जी का मोहनी रूप एवं शिव जी का गोपेश्वर महादेव का अवतार l राजस्थान ललित कला अकादेमी में अध्यक्ष श्री लक्ष्मण व्यास जी के कार्यकाल के एक वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में एवं रक्षा बंधन के पावन पर्व पर राजस्थान के महिला चित्रकारों को उपहार स्वरूप अकादमी की ओर से " रंग-सूत्र " कला प्रदर्शनी का आयोजन 24 अगस्त से 4 सितंबर 2023 तक किया गया है l जिसमे विनीता आर्ट द्वारा 'क्यूरेटर' एवं डॉ. ज्योति गौतम द्वारा 'सह क्यूरेटर' की भूमिका निभायी गयी l

प्रदर्शनी का उद्घाटन विशिष्ट अतिथि माननीय महोदया गायत्री राठौर ( पर्यटन, कला एवं संस्कृति विभाग की प्रमुख सचिव ) एवं माननीय प्रियंका जोधा ( ADG, JKK) के करकमलो द्वारा किया गया l

मैं सर्व प्रथम यह स्पष्ट करना चाहुँगी कि इस लेख में "रंग-सूत्र" के प्रदर्शनी में प्रदर्शित चित्रों के विषय में उनके वैचारिक पक्ष पर ही लिखा जाएगा, जो कलाकार एवं लेखक के विचारों की मिली-जुली समीक्षा है l यहां किसी भी कृति के तकनीकी पक्ष या अन्य किसी प्रकार के पहलु पर कोई विचार नहीं किया गया है l ना ही कलाकार के व्यक्तिगत जीवन का कोई उल्लेख को आधार बनाया गया है l यहां केवल कलाकार के अपणे-अपणे कृतियों के भावों का लेखन है , वो भी केवल उनके जिन्होंने स्वयं से मुझसे अपने विचार साझा किए है l

इसका प्रारंभ सर्व प्रथम जयपुर की वरिष्ठ चित्रकार नीलम नियाज़ी जी के कृति से श्री गणेश करते हुये करते है l क्योंकि इन्होंने पुष्प के चित्रण के साथ ही पुष्प समर्पित करने के साथ-साथ अपनी कविता की पंक्तियाँ भी हमें भेट की है जैसे की -...

'गुलों में रंग भरे बाद ए नौ बहार चले l

चले भी आओ के गुलशन का कारोबार चले ll'

इन्होंने अपने चित्र शीर्षक " गुलों के रंग" के लिए यह परिभाषित किया कि विभिन्न रंग बिरंगे फूल एक दूसरे से जुड़े हुए भारत की एकता वा अखंडता के प्रतीक हैं । उसी प्रकार हम सभी मिलकर इतिहास रच सकते है l

अब मैं उस शख्सियत की बात करना चाहूँगी जिसे जयपुर ही नहीं कला जगत की विदुषी कहाना गलत नहीं होगा l जो मेरी गुरु समान भी है I क्योंकि कभी ना कभी दृश्य कला का हर विद्यार्थी इनकी पुस्तक पढ़ चुके है l जी हाँ मैं डॉ. रीता प्रताप की बात कर रही हूँ l उन्होंने " राजस्थान " नामक अपनी चित्र कृति में पुष्कर मेले के उत्सव को दिखाया है I यह मेला कहीं ना कहीं इनके मानस पटल पर अंकित हो गया है l जिसे धरातल पर रंगों के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है l

अजमेर से डॉ. अर्चना ने "नारी शक्ति" को महत्व दिया है l उनका मानना है कि इस सृष्टि में नारी को शक्ति स्वरूपा दिखाया गया है अनेको संघर्षों से गुजरने पर भी नारी ने हार नहीं मानी इसीलिए चित्रकृति में आंसुओं को मोती एवं सपनों को घुंघरू के रूप में दर्शाया गया है सर पर मुकुट शक्ति के प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया है l

अजमेर की डॉ. नीहारिका राठौड़ "तेजोमय" नामक चित्र के माध्यम से यह समझाने का प्रयास किया है कि- यदि हम में ज्ञान होगा तो हम पृथ्वी से लेकर आकाश तक को जान सकते हैं। शिखा को समस्त लोक में विचरण करते हुए इस भावना से बनाया है कि ज्ञान यानी तेज शिखा प्रतीक के माध्यम से सद्विचार मनुष्य में स्थापित रहेंगे चोटी में ये ही श्लोक लिखा है-

ॐचिद्रूपिणि महामाये, दिव्यतेजः समन्विते।

तिष्ठ देवि शिखामध्ये, तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे॥

शरीर में सात रंग चक्रों को बताते हैl

हाथ कर्म और पैर गति को बताते हैं ।

जयपुर चित्रकार डॉ. गीता शर्मा जी ने "गहराई" शीर्षक चित्र में स्त्री के सकारात्मक पक्ष को व्यक्त किया है l जैसे कि - एक वृक्ष की जड़ें जिस प्रकार गहराई में समाहित हैं उसी प्रकार नारी की जड़ें भी इस समाज में परिवार में बहुत गहरे तक हैं जो संपूर्णता को जोडे हुए हैं l

अजमेर की डॉ. ऋतु शिल्पी का "वात्सल्य" चित्र मां के आंचल में शिशु का पल्लवन और सूखे वृक्ष में नवीन कोंपल को दर्शाया है। सूखे वृक्ष के नीचे भी मां शिशु को तरुवर की छाया दे रही है। मातृत्व शक्ति को प्रमाण करता है l

डॉ. नीरु कल्ला जयपुर की चित्रकार ने "राहों में प्रतीक्षा" नामक अपनी रचना के लिए निम्न पंक्तियों से भाव प्रस्तुत किया हैं जो कलाकृति को बनाते समय उनके मन में थे.... ऐ.. बरखा तू आज जरा थम के बरस..... मोहे पिया आवन को है... भीग गया अब तन मोरा... काहे अब तू शोर मचाये...... ?

जयपुर की कलाकार डॉ.ममता रोकना ने शीर्षक- सेरेनिटी नामक चित्र के विषय मे बताया है कि मैंने अपनी इस कलाकृति में रेखांकन के माध्यम से प्रकृति के प्रति प्रेम और सम्मान दिखाने की कोशिश की है। पृथ्वी पर सुखपूर्ण मानव जीवन के लिए सबसे महत्वपूर्ण तत्व हमारे आस पास के प्राकृतिक तत्व ही है l

प्रोफेसर बीना जैन जी का कहाना है कि राजस्थान में मांडना मांडने की परंपरा अति प्राचीन काल से प्रचलित है मांडने को हर उत्सव व त्यौहार पर मंगल का प्रतीक माना जाता है लेकिन वर्तमान काल में समय के अभाव व पक्के घरों के कारण इनका महत्व धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है‌ अतः मैं अपनी कला कृतियों द्वारा राजस्थान की समृद्ध लोक कला को पुनः जीवित करने की कोशिश कर रही हूं ।

जयपुर की कोलाज कलाकार डॉ. मणि भारतीय ने "कोलाज लैंडस्केप" चित्र में गोधुली बेला की प्राकृतिक दृश्य को पेपर कोलाज के माध्यम से बनाया है l चित्र देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो चित्रकार ने कई वर्षों के निरंतर अभ्यास एवं अनुभव को एक मूर्त रूप दिया है l

चित्रकार डाॅ. शकुन्तला महावर जी जयपुर में रहते हुए शिक्षण एवं चित्रण दोनों कार्य करती है l इन्होंने "राधा के साथ चंचल छेड़छाड़" चित्र के विषय में कहती है कि..जैसा कि हम सब को विदित है कि राधा व कृष्ण का रिश्ता प्रेम व छेड़छाड़ का रहा है। इस पेंटिंग के माध्यम से मैंने कृष्ण को राधा के साथ मोर पंख के माध्यम से छेड़खानी करते बनाया है l वही मैंने अपनी पेंटिंग के माध्यम से राजस्थान के हेरिटेज को बचाने का संदेश दिया है l क्योंकि वर्तमान समय में हमारे महलों मंदिरों की दीवारों पर जो पेंटिंग बनी हुई है वह कई जगह से क्षतिग्रस्त हो चुकी है। इसीलिए चित्र की पृष्ठभूमि में स्थापत्य को दर्शाया है।

स्वयं मैं डॉ. रेणु शाही चित्र कृति "पीड़ा" के माध्यम से ये बताना चाहती हूँ कि - जब कुछ लोगों द्वारा अपने निहित स्वार्थ के वशीभूत होकर थोड़े से लाभ के लिए अपने से अधिक योग्य व्यक्ति को गंदी राजनीति करके आगे नहीं बढ़ने देने की कोशिश की जाती है तो उस व्यक्ति को कितनी पीड़ा होती है, जो क्षमता वान होकर भी कुछ कर नहीं पता है जैसा- कि पक्षियों के पंख होते हुए भी वो उड़ ना पाये l मैंने अपने चित्र की धुंधली पृष्ट भूमि में समाज की नकारात्मकता को दिखाने का प्रयास किया है l और पंख होते हुए भी उड़ ना पाने की वेदना को परिभाषित किया है जो किसी स्त्री की भी हो सकती है l इसी कारण मेरे चित्र में निराशा के भाव व प्रकृति को एक साथ समाहित करने के भाव को प्रदर्शित किया है l

डॉ. अमिता राज गोयल जी "प्रकृति का आनंद" नाम वाली अपनी कृति के बारे मे बताते हुए कहती है कि पेंटिंग में ब्रश का हर स्ट्रोक परिदृश्य में जान फूंकता हुआ प्रतीत होता है। प्रकाश और छाया का खेल और तत्वों का संलयन एक ऐसा दृश्य बनाता है जो परिचित और आकर्षक रूप से नया लगता है।


डॉ. करुणा, वनस्थली विद्यापीठ में कार्यरत हैं l इन्होंने अपनी कलाकृति में हाथी, हवाईजहाज आदि को खिलोने रूप में दिखाया है l इनका मानना है कि बच्चों को सभी वस्तुएं अपने आस-पास चाहिए होती है l जो इस चित्र में एक साथ समाहित है l

जयपुर से उर्मिला गहनोलिया ने "प्रकृति ही जीवन है " के विषय में कहा है कि मैंने अपनी पेंटिंग में यह बताने का प्रयास किया है कि हम जितना प्रकृत्ति के करीब रहेंगे उतना ही अधिक स्वस्थ रहेंगे साथ में योगा करते हैं तो निरोगी जीवन मिलेगा। प्रकृति के करीब रहने से सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।

धर्मेन्द्रा शर्मा की "भूतपति" के लिए कलाकार का कहाना है कि- यह कलाकृति प्राचीन भारतीय धरोहर पर आधारित है जिसे बहुत बारीकी तथा कुशलतापूर्वक दर्शाने की कोशिश की गई हैं l यह हमारी संस्कृतिक धरोहर को जिवित रखने का एक प्रयास है।

जयपुर की सावित्री शर्मा, की कृति "विक्रमोर्वशीय" जल रंग में बने चित्र के बारे मे बताया कि यह प्रसंग कालिदास द्वारा रचित प्रख्यात उपन्यास विक्रमोर्वशीय का एक दृश्य हैं l जब अप्सरा उर्वशी अपनी दासी के साथ महाराज विक्रमादित्य से उनके महल जाती है, तब वह रानी और राजा के बीच हो रही बातें सुनकर प्रसन्न होती हैं, रानी के जाने के बाद उर्वशी चुपके से जाकर पीछे से राजा की आंखें बंद करतीं हैं l

अनामिका बरियार जी अपनी कृति 'रेड ग्रेस' के सन्दर्भ में कहती है कि ये कलाकृति तैलचित्र है जो रिवर्स (Reverse) तकनीक को इस्तेमाल करके बनाई गई है। इसमें मैने गुलाब के फूल के प्राकृतिक सौंदर्य को उभारने का प्रयास किया है l

वंदना अग्रवाल जी जयपुर की रहने वाली है इनके चित्र "बुद्ध - The Enlightened One" नमों बुद्धाय " के विषय में वर्णन दिया है कि राह संघर्ष की जो चलता है वो ही संसार को बदलता है जिसने रातों से जंग जीती हो सूर्य बनकर वो ही निकलता है।

जयपुर की ही पूर्णिमा पंत की कृति "चरखा चलाती युवती" के विषय में कहा कि आजादी के समय महिलाओ द्वारा चरखा कातना आत्मविश्वास व आत्मनिर्भरता जो स्वतंत्र भारत की पहचान है। मेरी कृति मेरे स्वतंत्रता सेनानी परिवार को समर्पित है l

नीलू कनवरिया जी की कृति अनकही कहानियां, चारकोल और सॉफ्ट पेस्टल में बनी है l चित्र के माध्यम से कलाकार ने वर्तमान भौतिक परिदृश्य में संघर्षरत मानवीय मनोदशा को चेहरे के हाव भाव से दर्शाते हुए प्रकृति और आध्यात्म के मार्ग को ही सर्वोत्तम सुख के रूप में चित्रित किया है ।

उदयपुर की दीपिका माली ने अमूर्त आकारों में बेहतर संयोजन सजाया है l इन्होंने अपने शहर के "सिटी स्केप" को बनाने का प्रयास किया है। पुराने शहर के संकरी गलियों में झांकते हुए घर, हवेलियां, झरोखे आदि को श्वेत श्याम रंगो में पिरोकर अपने केनवास पर उकेरने का एक सुन्दर प्रयास किया है।

जयपुर की रति जोशी चित्र शीर्षक "प्रकृति के रंग" में मयूर को केंद्र रखते हुए यह विचार दिए है कि - मोर, प्रेम और आकर्षण का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस कलाकृति में मानसून में प्राकृतिक खूबसूरती को दर्शाता है।

करौली की अंकिता मीना जो कि राजस्थान विश्वविद्यालय में इतिहास विषय की शोधार्थी हैं । उन्होंने चारकोल से निर्मित ‘नारी शक्ति‘ विषयक अपनी कलाकृति में यह दर्शाने का प्रयास किया है की स्त्री को समाज एवं घर में सदैव सम्मान मिलना चाहिये। जब जब स्त्रियों पर अत्याचार बढ़ जाता है तो वह काली माँ जैसा रूप धारण कर लेती है और अपराधियों का सर्वनाश कर देती है । जो लोग स्त्री का सम्मान नहीं करते और उन्हें कमजोर समझते हैं , वह नारी शक्ति के प्रभावशाली व्यक्तित्व से परिचित नहीं रहते हैं । स्त्री को अपने आत्मसम्मान की लड़ाई जरूर लड़नी चाहिए । राष्ट्रपिता गांधीजी ने कहा है की “मैं किसी के आत्मसम्मान की हानि की तुलना में अधिक नुकसान की कल्पना नहीं कर सकता ।”

इस संदर्भ में अंकिता ने "नारी शक्ति" और समर्पण पर वह अपने शब्दों में कुछ पंक्तियाँ लिखी हुयी हैं -

आँखों की जमीं पर ज्वाला जल रही है,

होठों पर चीख नहीं खामोशी पल रही है,

आँचल में छुपा लिए हैं अपने सारे भाव और वेदना,

उसी के समर्पण से ये दुनिया चल रही है l

उदयपुर की कुमुदिनी भरावा सोनी के चित्र "माय लिटिल लाइफ"

में इन्होंने स्वयं के बचपन से लेकर अपनी बेटी के बचपन तक के सफर को चित्रांकित किया है l एक औरत जिस प्रकार से छोटी - छोटी चीजों में अपनी खुशियां ढूंढती है और अपने आपको खुश रखती है l वो इस चित्र में दिखाने का एक प्रयास किया गया है।

कविता उपाध्याय, जयपुर से हैं l इनके चित्र " प्रकृति में ध्यान" में

इन्होंने प्रकृति एवं योग से प्रेरित होकर ध्यान में विलीन एक स्त्री की स्तिथि को दर्शाती है l स्वयं को शांति की ओर अग्रसर करती है। इस कृति में यह संदेश है कि हम किस तरह प्रकृति से जुड़े हैं तथा प्रकृति के साथ रहकर ख़ुदकी आंतरिक उन्नति किस प्रकार कर सकते हैं ? का बोध कराती हुई यह रचना मिश्रित माध्यम में बनाई गई है। जो हमें मानसिक शांति देती है l

जयपुर की ही कलाकार रेखा अग्रवाल ने "धान पीसती महिला" नामक पेंटिंग के जरिए यह कहना चाहती हैं कि पहले के जमाने में हमारी माँ चक्की से धान पीसकर घर को गोबर से लीपकर मांडना बनाकर घर को सजाना फिर अपने हाथों से भोजन बनाकर परिवार के साथ खाना बहुत ही अच्छा महसूस होता था l इस सन्दर्भ में एक कहावत भी है "जैसा खाए अन्न, वैसा बने मन"।

वंदना पांडे ने मेलटिंग स्नो के माध्यम से प्रकृति के सौंदर्य को दिखाया है l उन्होंने ठंड के बाद में पिघलने वाली बर्फ का चित्रण किया है l क्योंकि उन्हें प्रकृति में हो रहे दिन प्रतिदिन का परिवर्तन आकर्षित करत है l

रश्मि राजावत जी ने उड़ीक नामक कृति में फूल बेचने वाली महिला को खरीदार के इंतजार में दिखाया है l वह राहगीरों को इस आश देख रही है l कि कोई उसके समान को खरीद ले l जिससे उसे कुछ पैसे मिल जाये l

एक अलग ही माध्यम से अपने कला कृतियों को रूप देने वाली, जयपुर की कलाकार शीला पुरोहित जी ने अपने कृति "भरोसा " को कुछ इस प्रकार परिभाषित किया है 'भाई बहन का रिश्ता इतना अनूठापन लिए ह्रदय से जुड़ा होता है कि कितना भी लिखे पर कम ही रहेगा l उम्र के हर मुकाम पर भाई बहन का रिश्ता वही रहता है!एक ही पीढी के, लगभग एक ही जैसी परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है, एक दूसरे को ज्यादा समझते हैं, बहुत अच्छे दोस्त, शिक्षक और माता पिता के समान भावो का सम्मिश्रण होता है l जीवन के हर मुकाम पर हौंसला देते हैं l इन्ही भावों को समर्पित करती हुई मेरी कलाकृति में मैने अपने बच्चोों को बनाया है ' इसमें सांकेतिक रूप में साइकिल सीखने की घटना को लिया है l बहुत ही डरती हुई बहन अपने पैरों को भी पैडल पर नहीं रख रही है, पर भाई उसके डर को समझकर ही उसे प्यार से हिम्मत दे कर ,साथ देकर सिखा ही देता है l ये सिलसिला चलता रहता है जीवनपर्यन्त, बस घटनाओं का रूप बदलता रहता है l

इसमें मैने बेटी यशोधरा और बेटे हितार्थ को बनाया है l उनके बचपन की कुछ चीजों को भी जैसे हितार्थ का पुराना चश्मा, याशी के बचपन वाले तितलियों वाले क्लिप,कपड़े वगैरह लिए है, ताकि वो भाव आए l मेरा कला कृतियां मैं पेपरमेमेशी, कबाड़ और प्राकृतिक रंग से बनाती हूँ l घर में जबर्दस्ती घुस आई प्लास्टिक की थैलियों और पुरानी बेकार चीज़ो को मैं अपने आर्ट में उपयोग में लेकर कोशिश करती हूँ कि मेरी तरफ से कोई नुकसान पर्यावरण को ना पहुंचे l

शिवाली ढाका ने "रूट्स" नामक कलाकृति के बारे में कहा की अक्सर लोगों को आर्थिक, सामाजिक -सांस्कृतिक, राजनैतिक या अन्य कारणों की वजह से प्रवास करना पड़ता है किंतु घर से जुड़ी उनकी जड़ें इतनी मजबूत होती हैं जो उखड़ने की प्रक्रिया में मन-मस्तिष्क की दीवार पर अनेक दरारें छोड़ देती है किंतु पूर्ण रूप से मिट्टी से अलग नहीं होतीं।

जयपुर की चित्रकार कविता राठौर ने "कठपुतली "शीर्षक चित्र में यह संदेश देना चाहा है कि स्त्री पुरुष दोनों ही प्रकृति की रचनाएँ हैं l परंतु हमारे समाज मैं स्त्रियों को विभिन्न किरदार निभाने होते हैं। वह किसी की माँ है तो किसी कि पत्नी तो किसी कि बेटी या बहन और वह सभी किरदारों को बखूबी निभाती है। जैसे कोई कठपुतली अपने बंधनो से सीमित रहते हुए भी अपना सामंजस्य बनाये रखती है l उसे प्रकार स्त्री भी अपने विभिन्न प्यार भरे बंधनों मे रहते हुए भी अपनी पहचान बनाये रखती है। रिश्तों को धागों से बाँधकर संभालती है, और परिवार और समाज में सामंजस्य बनाती है। बचपन से ही मुझे कठपुतलियों और उनका अद्भुत संसार बहुत भाता था। अपने चित्र मैं मैंने स्त्री की इसी मनोदशा को एक कठपुतली के माध्यम से समझाने का प्रयास किया है ।

ममता देवड़ा , अजमेर से है l इन्होंने अपने "प्रकृति चित्रण " में यह दिखाने का प्रयास किया है कि प्रकृति मानव की चिरसंगिनी रही है । प्रकृति अपने - आप में सुंदर है l और मानव-स्वभाव से ही सौंदर्य-प्रेमी माना गया है। प्रकृति मानव की सदैव सहचरी रही है। प्रकृति के चित्रण के बिना कला संसार अधुरा है। जिसे मेरे द्वारा अमूर्त रूप में प्रस्तुत किया है l

ज्योत्सना शुक्ला कहती है कि बेसीकली मै महिला फिगर को लेकर काम करती हूं जिसमें मैं उसके अलग अलग दृष्टिकोण को दिखाने की कोशिश करती हु l एक महिला की सामाजिक स्थिति उसके इर्द-गिर्द होने वाले तमाम तरह की मुश्किलों और फिर उसे अपने उशुलो पर रह कर काम करना, उसकी भावनाएं उसके अस्तित्व, समाज में उसकी स्थिति कैसे वो उन सब को सह करके आगे बढ़ती है, बिल्कुल प्रकृति की तरह देने की प्रवृति रखने वाली लेकिन कोई अगर दुर्बेवहार करे तो वह विकराल रूप भी ले सकती है, इस पेंटिग में मैंने दिखाने की कोशिश की लोग कैसे परदे के पीछे भी रह कर इतने बड़े कार्य करने की क्षमता रखते है, स्त्री बहुत गहरी होती है बिल्कुल समुद्र की तरह वो जो ठान लेती फिर वो करके ही रहती है l

भावना सक्सेना जी जयपुर की चित्रकार है इन्होनें "अभिज्ञान शाकुंतलम" पर आधारित चित्र बनाया है l इन्होंने बनाया कि मैंने कालीदास के नाटक अभिज्ञान शकुंतलम को फड़ पेटिंग में दिखाया है। किस तरह राजा दुष्यन्त शिकार के लिए जाते है तो उनकी मुलाकात शकुंतला से हो जाती है और वो गंधर्व विवाह कर लेते है। अपनी निशानी अंगूठी शकुंतला को देकर, जल्दी आने का वादा कर के जाते है पर श्राप के कारण वो सब भूल जाते हैं और जब शकुंतला महल में उनसे मिलने जाती है तो वो उनको नहीं पहचानते हैं। अंगूठी भी पानी मे घिर जाती है। जो एक मछली निगल जाती हैं। फिर कुछ समय बाद एक मछुआरे को मिलती है वो उसको राजा के पास ले जाता है ।तब राजा को सब याद आता है और वो शकुंतला को अपना लेते है। इन को एक पुत्र होता है जो भारत कहलाता हैं l इसके नाम पर ही हमारे देश का नाम भारत रखा गया।

कोटा की सीमा शर्मा ने "आध्यात्मिक बह्मा जी" कलाकृति में बह्मा जी के आध्यात्मिक रूप को दिखाया गया है। जयपुर की प्रतिभा यादव ने "राधेय" में राधा कृष्ण के सात्विक प्रेम भाव को एक दूसरे के पीत और श्याम रंगो के वस्त्रधारण और भावों द्वारा दर्शाने की कोशिश की है l

जयपुर की मानसी शर्मा ने "कल्चर ऑफ़ राजस्थान" के विषय में बताया कि मैंने अपनी इस कलाकृति के माध्यम से राजस्थान के कल्चर को दर्शाने का प्रयास किया है राजस्थान मे विभिन्न प्रकार के म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट का प्रयोग किया जाता है अलगोजा इनमे से कुछ खास है l अलगोजा नाक से बजाया जाने वाला वाद्ययंत्र है l इसके प्रसिद्ध कलाकार रामनाथ चौधरी है l

स्मिता शुक्ला जयपुर की कलाकार है l इन्होंने "वात्सल्य" नामक में कलाकृती के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया हैं कि जिसतरह एक माँ अपने बच्चों को अपनी ममता, स्नेह, दुलार, अपनत्व की छाया देती है, उसी तरहा एक वट वृक्ष अपनी शाखाएं और घने पत्तों से सबको आश्रय और सुकून प्रदान करता है l

जयपुर की शिल्पा शर्मा ने "घर की गौरैया " चित्र के माध्यम से महिलाओं की, मुख्य रूप से अबला नारी की स्थिती को दर्शाता है। जिसमें महिलाओं को ना तो विचार व्यक्त करने, ना स्वयं से निर्णय लेने की शक्ति एवं अज्ञानता के अंधकार से गिरी हुई रही है। जोकि पिंजरे में कैद महिला की परिस्थिती को प्रदर्शित करता है। जैसे कि इनका मानना है कि वर्तमान समय में महिला सशक्तीकरण से विश्व स्तर तक काफ़ी बदलाव आया है l परन्तु आज भी कई महिलायें पिंजरे में कैद हैं।

तृप्ति निर्वाण जी ने अपने चित्र "चंद्रमाओं का सर्पिल: लौकिक शांति" में यह दर्शाया है कि सर्पिल, सतत विकास और अंतहीन चक्रों का एक प्राचीन प्रतीक, उद्देश्य के साथ आगे बढ़ता है, संकेत के उत्कृष्ट संदेश की असीमित यात्रा को उद्घाटित करता हैl

पूजा भारद्वाज जी ने "धर्म" नामक अपने चित्र के माध्यम से यह समझाने का प्रयास किया है कि इंसान कितना भी बोले मै जाति -धर्म् को नही मानता मगर उसका धर्म उसके खून मे होता है l और उसे अपने धर्म, रीती रिवाज से बहुत लगाव होता है। वो चाहता है की उसके धर्म से उसकी पहचान हो जैसे की उनके चित्र में सब कुछ रंग विहीन है l किन्तु धर्म का चिन्ह ( तिलक) रंगीन दिखाई दे रहा है। उनके अनुसार साम्प्रदायिकता आज पहले के मुकाबले ज्यादा बढ़ गई है।

जयपुर की रीना तोमर जी ने अपने कृति "महिला" के सन्दर्भ के कहती है कि मैंने अपनी कलाकृति मे एक राजस्थानी गढ़ियालोहार माहिला की सुन्दरता को दर्शाने का प्रयास किया है । जयपुर से ही एल. मोनिका देवी ने "सुगंध" नामक चित्र में फूलों की खुशबू को जीवंत रंगों और रेखाओं से चित्रित करने का प्रयास किया है। जयपुर की मीना जैन ने "उलझन" नामक कृति से बंधन से मुक्ति की चाहत को दिखाया है l

पूनम डिग्रवाल ने चित्र शीर्षक- "याली " के बारे में बताया कि याली जिसे व्याल भी कहा जाता है यह एक हिन्दू पौराणिक प्राणी है l जिसे एक सिंह के शिर और शरीर, एक हाथी की शुण्ड के साथ चित्रित किया गया है, और कभी-कभी इसमें समान विशेषताएँ होती हैं। कई दक्षिण भारतीय मन्दिरों में बनाया गया है जिन्हें अक्सर स्तंभों पर उकेरा जाता है। इसे त्रियाम में दर्शाने का प्रयास किया गया है I

जयपुर की किरण पवार ने अपणे "ईहा " चित्र का इस प्रकार से वर्णन किया l 'ईहा ( IEHA ) का अर्थ हमारी संस्कृत भाषा मे बहुत ही सुन्दर शब्दों मे वर्णित है| जिसका अर्थ होता है l इच्छा, कामना, कुछ कर गुजरने को आतुर हो l इस चित्र मे एक ग्रामीण पिता है l जो अपने प्रियजनों की इच्छाओ को पूरा करने के लिए आतुर नज़र आ रहा है l

इनके अतिरिक्त डॉ. रितिका गर्ग ने "अभिसारिका नायिका", निकहत तस्लीम काज़ी जी ने "पनोरमा", सोनी माहेश्वरी जी ने "फ्रीडम आफ वोमेंन ", अभिलाषा भारतीय ने "पेड़ की ठंडी छाव में", तथा उदयपुर से दिव्या चौहान ने अपने -अपने बहुमूल्य चित्रों के माध्यम से प्रदर्शनी को सफल बनाया है l एक कलाकार एवं कला मर्मज्ञ होने के दृष्टिकोण से मुझे इस आयोजन में कुछ खामियां भी थी l परतुं यहां उस विषय में चर्चा करना उचित नहीं रहेगा l बस इतना कहाना चाहूँगी कि समभाव की भावना रखते हुए एवं बिना किसी औपचारिकता के सच्चे हृदय से किया गया कार्य भविष्य के लिए हितकर होता है क्योंकि प्रकृति का नियम है कि जो हम करते है वही हमारे सामने आता है l परन्तु यह भी सत्य है कि ना होने से कुछ होना बेहतर है l अत : इसके लिए मैं राजस्थान ललित कला अकादमी के सभी सदस्यों को साधुवाद देती हूँ कि उन्होंने इस प्रकार के आयोजन को करने की पहल की है l और साथ ही यह आशा रहेगी कि इसे और बेहतर बनाने की कोशिश भी की जाएगी l

कार्यक्रम के समापन समारोह में कालबेलिया लोक नृत्य की प्रसिद्ध नृत्यांगना पद्मश्री गुलाबो के हाथों से सभी कलाकारों को सम्मान-पत्र देकर सम्मानित किया गया l इस अवसर पर अकादमी के अध्यक्ष लक्ष्मण व्यास ने सभी कलाकारों को "चित्र- सूत्र" प्रदर्शनी के सफल आयोजन की शुभकामनाएं प्रदान की

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धन्यवाद!

आलेख - डॉ. रेणु शाही

(कला आचार्य, कला समीक्षक, चित्रकार, कवयित्री एवं लेखक )


 
 
 

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