"एक स्मृति: पद्मश्री रामगोपाल विजयवर्गीय कला शिविर" आलेख: डॉ. रेणु शाही (कलाआचार्य, चित्रकार एवं कलासमीक्षक, जयपुर, राजस्थान)
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- 10 मई 2025
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"एक स्मृति: पद्मश्री रामगोपाल विजयवर्गीय कला शिविर"
आलेख: डॉ. रेणु शाही (कलाआचार्य, चित्रकार एवं कलासमीक्षक, जयपुर, राजस्थान)
जल महल के समीप, आमेर की ओर जाने वाले रास्ते पर कलात्मक वातावरण लिए हुए 'पद्मश्री रामगोपाल विजयवर्गीय संग्रहालय में एक पांच दिवसीय कला शिविर ३० अप्रैल से ५ मई २०२५ तक आयोजित किया गया। कड़ी गर्मी के बावजूद भी बड़ी संख्या में युवा कलाकारों ने शिविर में प्रतिभागिता की।

श्री कमल विजयवर्गीय ने स्व.रामगोपाल विजयवर्गीय के चित्र पर माल्यार्पण तथा दीपप्रज्वलन के साथ शिविर का शुभारंभ किया। उन्होंने कहा कि विजयवर्गीय का महाप्रयाण अक्षय तृतीया के दिन ही हुआ था जो एक कलाकार के लिए सौभाग्य की बात है।

डॉ. अन्नपूर्णा शुक्ला भी इस अवसर पर उपस्थित थीं। जिन्होंने कलाकारों के उत्साहवर्धन हेतु कई उपयोगी बातें बताई। उन्होंने रामगोपाल विजयवर्गीय के साथ के अपनी कुछ स्मृतियां भी साझा की। समारोह के समन्वयक व संयोजक प्रबोध कुमार गोविल ने बताया कि शिविर में बने चित्रों में से प्रदर्शन के लिए चित्रों का चयन किया गया है जहां इन्हीं में से चुनिंदा कुछ कलाकृतियों को ५००० रू. तथा चार ११०० के सांत्वना पुरस्कार भी दिए गए। बाकी सभी प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र के साथ प्रत्येक को ५०० की नकद राशी भी प्रदान किया गया। प्रथम स्थान पर पांच प्रतिभागी रहे जिसमे संध्या, गोरल कंसल, गौरव सोनी, हर्ष कुमार सैन और विपुल दाधीच तथा सांत्वना पुरस्कार में सौरभ यादव, मनस्विनी, शीला पुरोहित तथा अनंत विजयवर्गीय के नाम है।
शिविर में निर्मित चित्रों के अवलोकन हेतु शहर के कई गणमान्य व्यक्ति, कलाकार तथा साहित्य प्रेमी भी पधारे थे। इस अवसर पर स्व. कलाकार विजयवर्गीय के चित्रों को देखने का अवसर भी मिला जो वहीं के चित्र वीथिका में प्रर्दशित है।
शिविर के समापन पर पदमश्री स्व. राम गोपाल विजयवर्गीय के साहित्यिक अवदान पर भी विश्लेषणात्मक चर्चा की गई जिसमें सर्व श्री नरेंद्र शर्मा कुसुम, विनोद भारद्वाज, वीना चौहान, कविता मुखर, रमेश खत्री, संजीव चौधरी, डॉ. रेणु शाही, संदीप रावल के साथ प्रतिभागियों का भी योगदान रहा। नरेंद्र शर्मा ने कहा कि राम गोपाल विजयवर्गीय की कृतियां और साहित्य देश ही नहीं बल्कि समय की धरोहर है जो अन्य रचनाकारों की प्रेरणा बनी रहेगी। विजयवर्गीय जी के साहित्यिक रचनाओं में से कुछ का पाठन कविता मुखर और शिल्पी द्वारा किया गया।
ट्रस्ट द्वारा पिछली सभी प्रतियोगिताओं से कुछ कलाकृतियों को जापान में आयोजित अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन के लिए भी चुना गया है। जो भविष्य में होने वाला है। कमल विजयवर्गीय ने यह भी बताया कि भविष्य में जापान के कलाकारों की कृतियां भी हमें इस संग्रहालय में देखने के लिए उपलब्ध हो सकेंगी।
हर कला शिविर के तरह यहां भी कुछ प्रतिभागियों की कलाकृतियां स्वयं ही दर्शको को अपनी ओर आकर्षित किया। इसमें पेपरमेशी की कलाकार शीला पुरोहित ने इस कार्यशाला में श्वानों की तरफ से इंसानों से गुहार की है वह अपने कलाकृति "बिंजो की गुहार" में, जो कि पेपरमेशी और कबाड़ से बनाया गया है। बिंजो उन्हीं के म्यूजियम का एक प्यारा सदस्य लैब्राडोर है, उसकी तरफ से उसके साथी श्वानों की सारी जरूरतों और संघर्षों पर समाज का ध्यान आकर्षित करने के लिए गुहार को दर्शाता है।

गुहार यह है कि इतनी भीषण जानलेवा गर्मी में सड़क पर रहने वाले बे घर आवारा श्वानों के लिए हर घर के बाहर पानी की व्यवस्था की जाए। एक रोटी तो कम से कम हर घर से उनको दी ही जानी चाहिए। धूप से बचने के लिए वे बेचारे गाड़ियों के नीचे शरण लेते हैं, तब हर व्यक्ति पहले चेक कर ले कि कही लापरवाही से हम उनको घायल न कर दे। खाने के लिए याचना करने पर कुछ मीठे या नमकीन बिस्किट डाल दिए जाते हैं, जो उनके स्वास्थ्य के लिए जहर के समान हैं। किराने और चाय नाश्ते वाली दुकानों पर खास उनके लिए बनने वाले डॉग फूड या बिस्किट मिलने चाहिए जो शाकाहारी भी हो सकते हैं। कलाकार की संवेदनशीलता का प्रमाण यहां आसानी से देखा जा सकता है, की वे कहती है कि ये बेहद ही वफादार और प्यारे दोस्त हैं इंसान के लिए, इसलिए हमारा भी कर्तव्य है की हम उनका ध्यान रखे।
एक दूसरी कलाकृति जो की विपुल दाधीच ने बनाई है, में "माँ, घोंसलों की निर्माता शीर्षक नाम से है। जिसमे एक पक्षी मां के बारे में बताया गया है। अपने घोसले की नाजुक बुनाई में, एक माँ अदृश्य दुनिया का भार संभालती है - सपने जो अभी तक पैदा नहीं हुए हैं, उम्मीदें जो अभी तक नहीं बोली गई हैं। वह तूफान और नाजुकता के बीच खड़ी है, कोमलता के माध्यम से शक्ति, उपस्थिति के माध्यम से धैर्य सिखाती है।

एक माँ हर पल निर्माण करती है, आश्रय देती है, और जीवन में सांस लेती है, अपनी मौन प्रार्थनाओं और रातों की नींद हराम करके पीढ़ियों को ले जाती है। पंखों की सरसराहट और हवा की कोमल फुसफुसाहट में, उसकी प्रतिज्ञा गूंजती है:
मैं निर्माण करूँगी। मैं रक्षा करूँगी। मैं प्यार करूँगी - अंतहीन समय तक। यह अभीव्यक्ति है कलाकार की। यहां मैं एक और चित्र की चर्चा करूंगी जो सभी के उत्सुकता का कारण बना।

इन कला कृतियों के बीच गौरव सोनी की एक अलग कलाकारी स्टील के गिलास पर पदमश्री रामगोपाल विजयवर्गीय की छवि के रूप में दिखी। परन्तु वह चित्र गिलास पर नहीं बना है बल्कि कैनवास पर है। विकृत रूप में अर्द्धगोलाकार आकार में बनाया गया यह चित्र आकार में २४×३६ इंच के धरातल पर बना यह चित्र २४×२४ इंच है जिसे बनाने के लिए चारकोल पेंसिल और उसके डस्ट का इस्तेमाल किया गया है। चित्र दिखने मे आश्चर्य जनक है परंतु सही रूप को देखना हो तो एक स्टील के गिलास चाहिए होता है। गिलास को चित्र के मध्य भाग में रखने पर ही विजयवर्गीय को छवि स्पष्ट होती है।
यहां मैं एक और कलाकार प्रतिभागी पूर्णिमा पंथ की चर्चा करना चाहूंगी जो अपने चित्र और कविता के माध्यम से एक स्त्री को संदेश दे रही है इन पंक्तियों के माध्यम से -
बंधन तोड़ चली नारी
ना अब घूंघट की चुप्पी होगी,
ना साड़ी में सिमटी लाज,
नारी अब बोलेगी खुलकर,
रचेगी खुद अपना समाज।
बंधन तोड़ चली नारी
दहेज की आग में जलती,
अब नहीं होगी कोई दुल्हन,
बेटी अब अभिशाप नहीं,
वह जीवन की अमूल्य होएगा।
बंधन तोड़ चली नारी
ना शिक्षा से वंचित कोई,
ना सपनों पर लगें ताले,
नारी अब खुद लिखेगी,
आजादी के उजियारे।








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